NH-Garima Super

सरसों एवं राई की उन्नत खेती
भारत में रवि मौसम में उगाए जाने वाली तेलहनी फसलों में राई एवं सरसों का प्रमुख स्थान है। इसका उपयोग खाद्य तेल एवं जानवरों हेतु खली के रूप में किया जाता है। अधिक एवं गुणवत्ता युक्त उपज प्राप्त करने हेतु आवश्यक है कि इसकी खेती वैज्ञानिक ढंग से की जाय ताकी फसल से अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सके।
जलवायु: राई एवं सरसों ठण्डी एवं नम जलवायु की फसल है। इस लिए इसकी खेती शरद ऋतू में की जाती है।
भुमि: राई एवं सरसों की फसल की खेती के लिए हल्की मिट्टी से भारी दोमट उपयुक्त पायी गयी है। वैसे सभी प्रकार की मिट्टीयों में इसकी खेती सम्भव है ।
उन्नत प्रभेद: एन एच रुद्रा-105, एन एच गरिमा सुपर, करिश्मा गोल्ड (पीली सरसों)।
बीज की मात्रा: सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों में 5 से 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
बुआई का समय: - उपयुक्त समय सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा है। - असिंचित दशा में बुआई का उपयुक्त समय सितम्बर का द्वितीय पखवाड़ा है। - समकालीन फसल के लिए 1 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक। - पिछात फसल के लिए 25 अक्टूबर से 30 नवम्बर तक।
समय अवधि एवं उत्पादन: - सरसों की फसल 110 से 120 दिन तथा राई की फसल 100 से 110 दिन में तैयार होती है। - उत्पादन: 22 से 24 कुन्तल प्रति हेक्टेयर (सरसों), 18 से 20 कुन्तल प्रति हेक्टेयर (राई)।
सिंचाई: राई एवं सरसों की दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। - पहली सिंचाई फूल लगने के समय। - दूसरी सिंचाई फलीया बनते समय। खेत में नमी होने पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
उर्वरक प्रति हेक्टेयर:
- नाइट्रोजन: 40 से 60 किलो ग्राम
- पोटाश: 20 से 25 किलो ग्राम
- फास्फोरस: 25 से 30 किलो ग्राम
- जैविक खाद: 45 से 50 किलो ग्राम
फसल की कटाई: 75 प्रतिशत फलियाँ भूरी-पीली हो जाने पर फसल की कटनी कर लेनी चाहिए। बुआई के पूर्व बीज के अंकुरण क्षमता की जाँच अवश्य कर लेनी चाहिए।
नोट: वातावरण, मिट्टी, सिंचाई एवं देखरेख के बदलाव से उत्पादन क्षमता में परिवर्तन हो सकता है।
उत्पादित क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ इत्यादि।
 

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